जयंती का पौराणिक महत्व

माना जाता है कि सतयुग में एक बार सृष्टि पर भीषण तूफान का संकट आया, जिससे संपूर्ण जगत पर विनाश का खतरा मंडराने लगा। ऐसे समय में भगवान विष्णु ने सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित हरिद्रा सरोवर के पास तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर माँ बगलामुखी प्रकट हुईं और तूफान को स्तंभित कर दिया। इसी प्राकट्य दिवस को बगलामुखी जयंती के रूप में मनाया जाता है।

इसी कारण माँ बगलामुखी को स्तंभन शक्ति की देवी माना जाता है — जो शत्रु, वाद-विवाद, नकारात्मकता और बाधाओं को रोकने में समर्थ मानी जाती हैं।

बगलामुखी जयंती कब मनाई जाती है

पंचांग के अनुसार यह तिथि प्रतिवर्ष बदलती रहती है, इसलिए सटीक तिथि जानने के लिए मंदिर या स्थानीय पंचांग की सहायता लेना उचित रहता है। मंदिर की ओर से इस दिन की जानकारी सोशल मीडिया और व्हाट्सएप के माध्यम से पहले से साझा कर दी जाती है।

नालखेड़ा मंदिर में विशेष आयोजन

  • प्रातःकाल विशेष अभिषेक और श्रृंगार
  • दिनभर विशेष हवन एवं महा विशेष हवन का आयोजन
  • माँ बगलामुखी मूल मंत्र का सामूहिक जाप
  • संध्या के समय भव्य आरती और दीप सज्जा
  • प्रसाद वितरण और अन्नक्षेत्र सेवा

इस दिन मंदिर परिसर विशेष रूप से पीले और सुनहरे रंग के फूलों तथा दीपों से सजाया जाता है, क्योंकि पीला रंग माँ बगलामुखी को अत्यंत प्रिय माना जाता है।

इस दिन कौन-सी पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है

बगलामुखी जयंती पर पूजा या हवन करवाना विशेष फलदायी माना जाता है। जो श्रद्धालु शत्रु बाधा, न्यायालयीन मामलों या व्यापारिक विवादों से जूझ रहे हों, उनके लिए इस दिन विशेष हवन (₹5,600) या महा विशेष हवन (₹11,700) करवाना अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।

जो परिवार इस दिन विशेष रूप से आभार व्यक्त करना चाहते हैं, वे 36,000 मंत्र जाप या सवा लाख महा अनुष्ठान भी इसी अवसर के लिए चुनते हैं।

जिस दिन माँ प्रकट हुईं, उस दिन की गई प्रार्थना विशेष रूप से स्वीकार होती है, ऐसा भक्तों में सदियों से माना जाता रहा है।

दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सुझाव

जयंती के दिन मंदिर में भीड़ अधिक होती है, इसलिए उज्जैन-इंदौर से आने वाले श्रद्धालुओं को सुबह जल्दी निकलने की सलाह दी जाती है। जो लोग एक रात पहले पहुँचना चाहते हैं, वे नालखेड़ा में उपलब्ध विश्राम स्थलों में ठहर सकते हैं।

  • सुबह 5-6 बजे तक मंदिर पहुँचने का प्रयास करें
  • हवन बुकिंग के लिए एक-दो दिन पहले संपर्क करें
  • प्रसाद और चरणामृत श्रद्धा से ग्रहण करें
  • मंदिर परिसर में अनुशासन और स्वच्छता बनाए रखें