दुर्गा सप्तशती का संक्षिप्त परिचय
मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत आने वाली दुर्गा सप्तशती में मधु-कैटभ वध, महिषासुर वध और शुम्भ-निशुम्भ वध की तीन प्रमुख कथाएं वर्णित हैं। इन्हें क्रमशः प्रथम, मध्यम और उत्तर चरित्र कहा जाता है।
तीन चरित्रों का सार
प्रथम चरित्र
यह सबसे छोटा भाग है, जिसमें महाकाली की उपासना और मधु-कैटभ के वध का वर्णन है। इसे आरंभ में पढ़ा जाता है।
मध्यम चरित्र
इसमें महालक्ष्मी स्वरूप देवी द्वारा महिषासुर के वध का वर्णन है, जो समृद्धि और शक्ति दोनों से जुड़ा माना जाता है।
उत्तर चरित्र
यह सबसे बड़ा भाग है, जिसमें महासरस्वती स्वरूप देवी द्वारा शुम्भ-निशुम्भ वध की कथा है। इसमें प्रसिद्ध 'अर्गला स्तोत्र', 'कीलक स्तोत्र' और 'देवी कवच' भी सम्मिलित माने जाते हैं।
पाठ करने के मुख्य नियम
- पाठ प्रारंभ करने से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
- पाठ आरंभ करने से पहले कवच, अर्गला और कीलक स्तोत्र अवश्य पढ़ें
- एक बार आरंभ किया गया पाठ बीच में अधूरा न छोड़ें
- पाठ के दौरान मौन और एकाग्रता बनाए रखें
- पूर्ण पाठ में असमर्थ होने पर कम से कम अध्याय एक, चार, पाँच, सात, ग्यारह और बारह अवश्य पढ़ें
अक्सर होने वाली भूलें
बहुत से साधक जल्दबाज़ी में पाठ करते हैं, जिससे उच्चारण में त्रुटि हो जाती है। कुछ लोग कीलक स्तोत्र के बिना ही सीधे पाठ आरंभ कर देते हैं, जो शास्त्रों के अनुसार उचित नहीं माना जाता।
- पाठ के बीच में बात करना या उठना
- उच्चारण की शुद्धता पर ध्यान न देना
- अशुद्ध अवस्था में पाठ आरंभ कर देना
- अध्यायों का क्रम बदल देना
पाठ के लिए शुभ समय
नवरात्रि के नौ दिन दुर्गा सप्तशती पाठ के लिए सबसे शुभ माने जाते हैं, परंतु अष्टमी, नवमी या किसी विशेष संकल्प के अवसर पर भी यह पाठ किया जा सकता है। माँ बगलामुखी मंदिर नालखेड़ा में नवरात्रि के दौरान सामूहिक पाठ का आयोजन भी होता है, जिसमें दूर-दराज़ से श्रद्धालु सम्मिलित होने आते हैं।
दुर्गा सप्तशती के प्रत्येक श्लोक में देवी की शक्ति समाहित मानी जाती है, इसलिए इसे शुद्धता और श्रद्धा के साथ पढ़ना ही इसका वास्तविक फल देता है।
मंदिर में मार्गदर्शन की सुविधा
जो श्रद्धालु घर पर सही विधि से पाठ नहीं कर पाते, वे मंदिर के अनुभवी पुरोहितों से संकल्प सहित पाठ करवा सकते हैं। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो संस्कृत उच्चारण में असहज महसूस करते हैं।



