आरती का महत्व
आरती पूजा के अंतिम चरण में की जाती है, जिसमें दीपक घुमाकर देवी को प्रकाश अर्पित किया जाता है। माना जाता है कि आरती के समय देवी की चेतना पूर्ण रूप से प्रतिमा में जागृत रहती है, इसीलिए इस समय की गई प्रार्थना विशेष फलदायी मानी जाती है।
बगलामुखी आरती (हिंदी पाठ)
"जय बगला भवानी, माता जय बगला भवानी। पीताम्बर धारिणी, त्रिभुवन कल्याणी॥ पीत पुष्प पीत वस्त्र, पीत ही श्रृंगार। पीताम्बर में सोहत, हे जगदम्बे मात॥"
"शत्रु संहारक तू ही, वाणी की अधिष्ठात्री। बुद्धि विवेक प्रदायिनी, स्तंभन शक्ति दात्री॥ हरिद्रा माला धारिणी, गदा हाथ में शोभे। भक्तों के कष्ट हरण को, माता तुरंत दौड़े॥"
आरती का सरल अर्थ
इस आरती में देवी को पीतवस्त्रधारिणी, त्रिभुवन का कल्याण करने वाली, शत्रुओं का संहार करने वाली और वाणी की अधिष्ठात्री देवी बताया गया है। हल्दी की माला और गदा धारण करने वाली माँ अपने भक्तों के कष्टों को तुरंत दूर करने के लिए दौड़ती हैं, ऐसा वर्णन किया गया है।
बगलामुखी स्तोत्र
स्तोत्र देवी के गुणों और शक्तियों का विस्तृत वर्णन करने वाला पाठ है। मान्यता है कि नियमित स्तोत्र पाठ से साधक की वाणी में तेज आता है और शत्रु बाधाएँ स्वतः क्षीण होने लगती हैं। स्तोत्र का आरंभ प्रायः इस प्रकार होता है:
"ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा॥" — यह मूल मंत्र स्तोत्र के मूल भाव को प्रकट करता है।
आचार्य सतीश शर्मा के अनुसार — "मंत्र और स्तोत्र का उच्चारण शुद्धता से अधिक श्रद्धा माँगता है; भाव सही हो तो शब्द अपने आप शुद्ध होते जाते हैं।"
पाठ कब और कैसे करें
- प्रातःकाल स्नान के बाद शांत मन से पाठ करना उत्तम रहता है
- पीले वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है
- दीपक हल्दी या सरसों के तेल का जलाना उचित रहता है
- मंगलवार और शनिवार को पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है
- पाठ के दौरान आसन का प्रयोग करें और दिशा का ध्यान रखें
शुद्धता और नियमों का ध्यान
स्तोत्र पाठ के दौरान शारीरिक और मानसिक शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बिना गुरु-मार्गदर्शन के उच्च साधनाओं में प्रवेश करने से बचना चाहिए; प्रारंभिक स्तर पर आरती और सामान्य स्तोत्र पाठ ही पर्याप्त और सुरक्षित माने जाते हैं।
मंदिर में सामूहिक पाठ का अनुभव
नालखेड़ा मंदिर में संध्या आरती के समय सामूहिक रूप से आरती गाई जाती है, जिसका वातावरण अत्यंत भक्तिमय होता है। जो श्रद्धालु दूर हैं, वे घर पर भी उसी समय पर पाठ करके स्वयं को उस ऊर्जा से जोड़ सकते हैं।



